01

Accident

लखनऊ, इंडिया

रात का वक्त

8:15 PM

कुछ घरों की दीवारें ईंटों और पत्थरों से बनी होती हैं।

और कुछ घर…

उन लोगों की हँसी से बने होते हैं, जो उनमें रहते हैं।

मयूरा मलानी का घर भी ऐसा ही था।

बहुत बड़ा नहीं था, न ही किसी आलीशान महल जैसा। लेकिन उस घर के हर कोने में एक अजीब-सी गर्माहट थी। दीवारों पर टंगी तस्वीरें, सोफे पर पड़े कुशन, खिड़कियों के पास रखे छोटे-छोटे पौधे और रसोई से आती खाने की खुशबू—सब मिलकर उस घर को घर बनाते थे।

और उस रात…

उस घर में कुछ खास होने वाला था।

बाहर लखनऊ की सड़कें तेज़ बारिश से भीग चुकी थीं।

आसमान पर घने काले बादल छाए हुए थे। हवा इतनी तेज़ चल रही थी कि घर के बाहर लगे पेड़ों की शाखाएँ लगातार खिड़कियों से टकरा रही थीं। कभी-कभी बिजली की चमक पूरे आसमान को कुछ पलों के लिए रोशन कर देती और उसके बाद होने वाली गर्जना घर की शांत दीवारों तक सुनाई देती।

लेकिन घर के अंदर…

एक चौदह साल की लड़की को बाहर के मौसम से ज़्यादा चिंता इस बात की थी कि उसके मम्मी-पापा अभी तक घर क्यों नहीं पहुँचे थे।

“ये वाला ribbon थोड़ा ऊपर लगाइए ना!”

मयूरा ने सोफे पर खड़े होकर सामने दीवार की तरफ इशारा किया।

“बस, बहुत हो गया,” रसोई से आती आवाज़ ने उसे रोक दिया। “नीचे उतर जाओ, मयूरा।”

“बस दो मिनट, कविता आंटी!”

“दो मिनट में अगर नीचे गिर गई ना, तो तुम्हारे मम्मी-पापा की anniversary से पहले मुझे तुम्हें अस्पताल ले जाना पड़ेगा।”

मयूरा ने तुरंत नीचे देखा।

कविता आंटी हाथ में प्लेट लिए उसके सामने खड़ी थीं। उनके चेहरे पर नाराज़गी थी, लेकिन आँखों में वही अपनापन था, जो हमेशा रहता था।

“मैं नहीं गिरूँगी,” मयूरा ने मासूमियत से कहा।

“हाँ, और मैं लखनऊ की महारानी हूँ।”

मयूरा हँस पड़ी।

“कविता आंटी!”

“नीचे उतर।”

“बस ये आखिरी ribbon।”

कविता आंटी ने गहरी साँस ली और सिर हिलाया।

“तुम बिल्कुल अपने पापा पर गई हो।”

“Thank you.”

“ये compliment नहीं था।”

“मुझे पता है।”

दोनों की हँसी पूरे कमरे में फैल गई।

कुछ ही सेकंड बाद मयूरा आखिरकार सोफे से नीचे उतर आई और पीछे हटकर पूरे कमरे को देखने लगी।

दीवार पर छोटे-छोटे fairy lights लगी थीं। बीच में रंगीन कागज़ से बना एक छोटा-सा banner था। Dining table पर एक सुंदर cake रखा था और उसके पास दो neatly wrapped gift boxes रखे थे।

मयूरा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।

“अब?”

कविता आंटी ने पूरे कमरे पर नज़र दौड़ाई।

फिर मुस्कुराईं।

“अब perfect।”

मयूरा की आँखें चमक उठीं।

“सच?”

“सच।”

“मम्मी-पापा को अच्छा लगेगा ना?”

कविता आंटी ने उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर उस वक्त इतनी मासूम खुशी थी कि कविता आंटी चाहकर भी उसे छेड़ नहीं सकीं।

“बहुत अच्छा लगेगा।”

“Promise?”

“Promise।”

मयूरा मुस्कुरा दी।

आज उसके मम्मी-पापा की शादी की सालगिरह थी।

और इस बार वह उन्हें surprise देना चाहती थी।

पिछले कई दिनों से वह इस surprise की तैयारी कर रही थी। उसने अपनी छोटी-छोटी बचत इकट्ठा की थी, कविता आंटी की मदद से decoration का सामान खरीदा था और फिर gifts भी।

टेबल पर रखे दोनों gift boxes को देखते हुए उसके चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।

“ये वाला मम्मी के लिए है,” उसने एक box उठाते हुए कहा।

“मुझे पता है।”

“और ये पापा के लिए।”

“ये भी पता है।”

“लेकिन आपको ये नहीं पता कि पापा को ये कितना पसंद आने वाला है।”

कविता आंटी ने भौंहें उठाईं।

“अच्छा?”

“हाँ।”

मयूरा ने दूसरा gift box अपने हाथ में लिया।

“उनका wallet कितना पुराना हो गया है।”

“हाँ, वो तो है।”

“मैंने कितनी बार कहा नया ले लीजिए, लेकिन वो सुनते ही नहीं।”

“क्योंकि तुम्हारे पापा को अपनी चीज़ें बदलना पसंद नहीं है।”

“तो अब बदलना पड़ेगा।”

“क्यों?”

मयूरा ने गर्व से कहा—

“क्योंकि ये मैंने खरीदा है।”

कविता आंटी हँस पड़ीं।

“बहुत अकड़ है तुममें।”

“अपने पापा पर गई हूँ।”

“और ज़िद?”

“वो भी उन्हीं पर।”

“और बातें?”

“वो मम्मी पर।”

“हाँ, बिल्कुल।”

मयूरा ने हँसते हुए कविता आंटी को गले लगा लिया।

कविता आंटी एक पल के लिए चुप हो गईं।

वह पिछले कई सालों से इस घर में थीं।

शुरुआत में वह सिर्फ़ घर का काम संभालने आई थीं।

लेकिन धीरे-धीरे…

मयूरा की सुबह की चोटी बनाना, उसके लिए टिफिन तैयार करना, स्कूल से लौटने के बाद उसका इंतज़ार करना और उसके बीमार पड़ने पर पूरी रात उसके पास बैठना—ये सब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था।

मयूरा भी उन्हें कभी सिर्फ़ घर में काम करने वाली महिला की तरह नहीं देखती थी।

वह उसके लिए कविता आंटी थीं।

घर की सबसे भरोसेमंद इंसान।

“अच्छा, अब ये सब छोड़ो,” कविता आंटी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा। “पहले कुछ खा लो।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“मम्मी-पापा के साथ खाऊँगी।”

“तब तक भूखी बैठी रहोगी?”

“हाँ।”

“मयूरा।”

“बस थोड़ा-सा।”

कविता आंटी ने उसे घूरा।

“तुम्हें पता है ना, मैं तुम्हारी मम्मी से ज्यादा डाँट सकती हूँ?”

मयूरा मुस्कुरा दी।

“नहीं।”

“अच्छा?”

“क्योंकि मम्मी की डाँट से ज्यादा कोई डरा नहीं सकता।”

दोनों फिर हँस पड़ीं।

तभी बाहर बिजली चमकी।

कमरे की खिड़कियों पर रोशनी का एक तेज़ झटका पड़ा और कुछ ही सेकंड बाद बादल ज़ोर से गरजे।

मयूरा की मुस्कान हल्की पड़ गई।

उसने खिड़की की तरफ देखा।

बारिश अब पहले से कहीं ज्यादा तेज़ हो चुकी थी।

“कविता आंटी…”

“हूँ?”

“मम्मी-पापा अभी तक आए क्यों नहीं?”

कविता आंटी ने घड़ी की तरफ देखा।

8:30 PM

“आते ही होंगे।”

मयूरा ने फोन उठाया और अपने पापा का नंबर मिलाया।

कॉल गई।

लेकिन किसी ने उठाया नहीं।

उसने माथा सिकोड़ लिया।

“देखा?”

“काम में होंगे।”

“आज?”

“आज भी।”

“लेकिन आज anniversary है।”

“तो क्या हुआ?”

मयूरा ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

कविता आंटी मुस्कुराईं।

“तुम्हारे पापा हैं। उन्हें अगर दुनिया खत्म होने की खबर भी मिल जाए, तो पहले अपना काम खत्म करेंगे।”

मयूरा ने होंठ दबाकर हँसी रोकने की कोशिश की।

“ऐसा मत बोलिए।”

“सच है।”

उसने फिर फोन की screen की तरफ देखा।

कोई नया message नहीं था।

उसके मम्मी-पापा शहर के दूसरे हिस्से में किसी काम से गए थे और वहाँ से लौट रहे थे।

मयूरा को बस इतना पता था।

बाकी उसने जानने की कोशिश भी नहीं की थी।

आज उसे सिर्फ़ अपने surprise की चिंता थी।

“जब आएँगे ना,” उसने धीरे से कहा, “तो lights off कर देंगे।”

“हूँ।”

“और जैसे ही दरवाज़ा खुलेगा…”

“तुम चिल्लाओगी।”

“Happy Anniversary!”

“इतनी तेज़ मत चिल्लाना कि तुम्हारे पापा वापस बाहर चले जाएँ।”

“कविता आंटी!”

मयूरा ने एक cushion उठाकर अपनी गोद में रख कर मुंह फूला लिया

कविता ने उससे देखते हुए बोली

“बस यही रह गया था।”

“आप हमेशा मेरा mood खराब करती हैं।”

“और फिर ठीक भी मैं ही करती हूँ।”

“वो भी सही है।”

समय धीरे-धीरे बीतता गया।

8:45।

9:00।

9:20।

अब मयूरा बार-बार घड़ी की तरफ देखने लगी थी।

पहले वह उत्साहित थी।

फिर थोड़ी परेशान हुई।

और अब…

उसकी बेचैनी साफ़ दिखाई देने लगी थी।

“एक बार फिर call करो,” कविता आंटी ने कहा।

मयूरा ने तुरंत अपनी माँ का नंबर मिलाया।

फोन बजता रहा।

लेकिन किसी ने नहीं उठाया।

उसने कॉल काट दी।

“शायद drive कर रही होंगी।”

कविता आंटी ने कहा।

“लेकिन पापा?”

मयूरा ने तुरंत उनका नंबर मिलाया।

इस बार कुछ सेकंड बाद फोन बंद होने की सूचना आई।

उसके चेहरे की चमक एकदम गायब हो गई।

“Phone बंद है।”

“Battery खत्म हो गई होगी।”

“दोनों के फोन एक साथ?”

कविता आंटी कुछ सेकंड चुप रहीं।

फिर उन्होंने सामान्य आवाज़ में कहा—

“बारिश में network भी चला जाता है।”

मयूरा ने उनकी तरफ देखा।

“सच?”

“हाँ।”

लेकिन कविता आंटी के दिल में भी अब हल्की-सी चिंता जाग चुकी थी।

उन्होंने बाहर की तरफ देखा।

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

“आप परेशान हो रही हैं?” मयूरा ने तुरंत पूछ लिया।

“नहीं।”

“झूठ।”

“तुम्हें हर बात में मेरी शक्ल पढ़ना जरूरी है?”

“हाँ।”

कविता आंटी उसके पास आकर बैठ गईं।

“बस traffic में फँसे होंगे।”

मयूरा ने सिर हिलाया।

वह इस बात पर विश्वास करना चाहती थी।

10:00 PM

Cake अब भी वैसा ही रखा था।

मोमबत्तियाँ अब तक जलाई नहीं गई थीं।

Fairy lights जल रही थीं, लेकिन उनकी चमक अब पहले जैसी खुशहाल नहीं लग रही थी।

मयूरा मुख्य दरवाज़े के पास खड़ी थी।

हर गुजरती गाड़ी की आवाज़ पर वह उम्मीद से बाहर देखने लगती।

फिर जब वह गाड़ी आगे निकल जाती…

उसके चेहरे पर निराशा उतर आती।

“अंदर आओ,” कविता आंटी ने कहा।

“नहीं।”

“ठंड लग जाएगी।”

“मैं ठीक हूँ।”

“मयूरा।”

“बस पाँच मिनट।”

कविता आंटी जानती थीं कि ये पाँच मिनट कभी सिर्फ़ पाँच मिनट नहीं होते।

लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

वह उसके पास आकर खड़ी हो गईं।

कुछ देर तक दोनों चुप रहीं।

फिर मयूरा ने धीमे से पूछा—

“अगर उन्हें surprise पता चल गया होगा तो?”

कविता आंटी ने उसकी तरफ देखा।

“तो?”

“तो मज़ा खराब हो जाएगा।”

“मुझे नहीं लगता।”

“क्यों?”

“क्योंकि surprise decoration में नहीं होता।”

मयूरा ने उनकी तरफ देखा।

“तो कहाँ होता है?”

कविता आंटी ने उसके दिल पर हल्के से हाथ रखा।

“यहाँ।”

मयूरा मुस्कुरा दी।

“आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें करती हैं।”

“कभी-कभी?”

“बाकी समय irritating।”

“अच्छा।”

कविता आंटी ने उसकी नाक हल्के से दबाई।

मयूरा हँस पड़ी।

उस हँसी के पीछे छिपी बेचैनी को शायद दोनों महसूस कर रही थीं।

लेकिन दोनों ने उस पर बात नहीं की।

11:15 PM

अब कविता आंटी ने मयूरा को सोफे पर बैठा दिया था।

“बस।”

“लेकिन—”

“कोई लेकिन नहीं।”

“मैं दरवाज़े के पास बैठूँगी।”

“यहीं बैठो।”

“कविता आंटी।”

“मयूरा।”

दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखती रहीं।

फिर मयूरा ने हार मान ली।

वह सोफे पर बैठ गई।

उसका फोन उसके हाथ में था।

उसकी उँगलियाँ बार-बार screen को unlock करतीं।

फिर वापस बंद कर देतीं।

कोई call नहीं।

कोई message नहीं।

“क्या मैं परेशान हो सकती हूँ अब?”

उसने धीरे से पूछा।

कविता आंटी का दिल भर आया।

लेकिन उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अभी तक परेशान होने वाली कोई बात नहीं हुई है।”

मयूरा ने उनकी बात पर विश्वास करने की कोशिश की।

“Promise?”

कविता आंटी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“Promise।”

उस रात कविता आंटी ने यह नहीं सोचा था कि उनका दिया हुआ promise…

सुबह तक उनके लिए भी टूट जाएगा।

कब मयूरा की आँख लग गई, उसे पता नहीं चला।

वह सोफे पर ही बैठी-बैठी सो गई थी।

कविता आंटी ने धीरे से उसके ऊपर एक blanket रख दिया।

फिर एक बार मुख्य दरवाज़े की तरफ देखा।

रात बहुत आगे बढ़ चुकी थी।

उनकी बेचैनी अब चिंता बन चुकी थी।

उन्होंने फिर एक बार Mayura की माँ और पिता दोनों को call किया।

कोई जवाब नहीं।

उनकी उँगलियाँ काँप गईं।

लेकिन उन्होंने खुद को संभाला।

“सब ठीक होगा…”

उन्होंने धीरे से कहा।

शायद खुद को समझाने के लिए।

सुबह की हल्की रोशनी खिड़कियों से अंदर आ चुकी थी।

मयूरा की आँख दरवाज़े की घंटी से खुली।

वह एकदम उठ बैठी।

कुछ सेकंड तक उसे समझ नहीं आया।

फिर उसकी नज़र decorations पर गई।

उसकी आँखें चमक उठीं।

“मम्मी-पापा!”

वह तेजी से उठी।

लेकिन कविता आंटी पहले ही दरवाज़े की तरफ जा चुकी थीं।

मयूरा ने उन्हें पीछे से देखा।

“रुकिए!”

वह हँसते हुए बोली।

“Lights off कर देते हैं!”

लेकिन कविता आंटी ने उसकी तरफ मुड़कर नहीं देखा।

उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था…

जिसने मयूरा की मुस्कान रोक दी।

“कविता आंटी?”

दरवाज़े की घंटी फिर बजी।

इस बार कविता आंटी ने दरवाज़ा खोला।

बाहर खड़े लोगों को देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

मयूरा धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

“कविता आंटी…”

उनकी आँखों में आँसू आ चुके थे।

और उस एक पल में…

मयूरा के दिल में पहली बार एक ऐसा डर पैदा हुआ, जिसका नाम वह नहीं जानती थी।

“क्या हुआ?”

उसकी आवाज़ धीमी थी।

बाहर खड़ा व्यक्ति कुछ बोल रहा था।

लेकिन मयूरा को उसकी आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं दे रही थी।

उसके कानों में जैसे एक अजीब-सी आवाज़ गूँज रही थी।

फिर उसने सिर्फ़ कुछ शब्द सुने।

Accident.

उसकी साँस अटक गई।

Hospital.

उसने कविता आंटी की तरफ देखा।

और फिर…

वह शब्द।

जिसे सुनने के बाद कोई भी दुनिया पहले जैसी नहीं रहती।

कविता आंटी की आँखों से आँसू बह निकले।

मयूरा का शरीर जैसे सुन्न पड़ गया।

उसने सिर हिलाया।

“नहीं।”

किसी ने कुछ कहा।

“नहीं।”

इस बार उसकी आवाज़ तेज़ थी।

“आप गलत बोल रहे हैं।”

उसकी नज़र living room की तरफ गई।

Cake।

Decorations।

दो gift boxes।

सब कुछ वहीं था।

“आज…”

उसकी आवाज़ काँप गई।

“आज उनकी anniversary है।”

उसकी आँखें कविता आंटी पर टिक गईं।

“वो आने वाले हैं।”

कविता आंटी आगे बढ़ीं।

लेकिन मयूरा पीछे हट गई।

“वो आने वाले हैं ना?”

कोई जवाब नहीं।

“कविता आंटी…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“बोलिए ना…”

और इस बार…

कविता आंटी खुद को रोक नहीं सकीं।

उन्होंने मयूरा को अपने सीने से लगा लिया।

मयूरा कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर रही।

फिर जैसे उसकी पूरी दुनिया का बोझ अचानक उसके छोटे-से शरीर पर आ गिरा।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसके हाथ कविता आंटी के कपड़ों को पकड़ चुके थे।

उस सुबह…

मयूरा ने अपने माता-पिता को खोया था।

लेकिन शायद उसी सुबह…

उसकी

जिंदगी में एक और रिश्ता जन्म ले रहा था।

एक ऐसा रिश्ता…

जिसका नाम खून का रिश्ता नहीं था।

लेकिन आने वाले वर्षों में…

कविता आंटी उसके लिए माँ से कम नहीं रहने वाली थीं।

और उस रात का इंतज़ार…

उसके जीवन का आखिरी ऐसा इंतज़ार बन गया,

जिसमें उसे उम्मीद थी कि

दरवाज़ा खुलेगा…

और उसके मम्मी-पापा घर वापस आ जाएँगे।

Bye guyss milte hai next chapter mein ❤️ 💋

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