छह साल बाद
लखनऊ, इंडिया
सुबह का वक्त
एक औरत के चिल्लाने की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—
“अरे कलमुंही! कहाँ मर गई? मेरी बेटी का कमरा कौन साफ करेगा? तेरे मरे हुए माँ-बाप आएँगे क्या साफ करने?”
तभी पीछे से एक और औरत की आवाज़ आई—
“मालकिन, वो सो रही है। उसकी तबीयत खराब है।”
वो औरत सीमा थी—मयूरा की चाची।
सीमा ने गुस्से से कविता की तरफ देखा और ताना मारते हुए बोली—
“कविता, तुम्हारी मयूरा की तबीयत हमेशा ही खराब रहती है क्या?”
कविता ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मालकिन, आपको तो पता है ना… वो बच्ची है अभी। उसने बहुत कुछ देखा है—”
कविता अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही सीमा ने उसे बीच में रोक दिया—
“हाँ, ठीक है! अब ज़्यादा ज्ञान मत बाँटो। जाओ, मेरी बेटी नियति का कमरा साफ करो।”
कविता ने कुछ नहीं कहा। वो चुपचाप नियति के कमरे की तरफ चली गई।
नियति का कमरा साफ करने के बाद कविता मयूरा के पास जाने ही वाली थी कि सीमा की आवाज़ फिर सुनाई दी—
“खाना लगाओ टेबल पर!”
कविता ने एक पल के लिए मयूरा के कमरे की तरफ देखा। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वो चाहती थी कि पहले मयूरा को दवाई दे आए, उसका माथा छूकर देख ले और उसे थोड़ा पानी पिला दे।
लेकिन सीमा की आवाज़ दोबारा आई—
“कविता! सुनाई नहीं दे रहा क्या?”
कविता ने गहरी साँस ली और चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गई।
टेबल पर सीमा, उसका पति अनिल और उनकी बेटी नियति पहले से बैठे हुए थे।
अनिल, मयूरा के चाचा, अपना बिज़नेस चलाता था। वहीं नियति कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की थी। ये तीनों मयूरा को कभी पसंद नहीं करते थे। उनके लिए मयूरा इस घर की बेटी नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िम्मेदारी थी जिसे वो मजबूरी में निभा रहे थे।
कविता ने खाना टेबल पर लगाया और धीमी आवाज़ में पूछा—
“मालकिन, अब मैं जाऊँ?”
सीमा ने उसकी तरफ देखे बिना हाथ से जाने का इशारा कर दिया।
कविता तुरंत वहाँ से निकल गई और सर्वेंट रूम की तरफ बढ़ गई।
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मयूरा अब बीस साल की हो चुकी थी।
छह साल पहले अपने माँ-बाप को खोने के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई थी। जिस उम्र में उसे अपने माता-पिता के प्यार, सुरक्षा और सहारे की ज़रूरत थी, उस उम्र में उसे अपने ही रिश्तेदारों के घर में पराया बना दिया गया था।
मयूरा पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए वो पूरी मेहनत कर रही थी। अपनी मेहनत और अच्छे अंकों के दम पर उसे स्कॉलरशिप मिली थी और अब वो कॉलेज में पढ़ रही थी।
उसकी आँखों में अपने भविष्य को लेकर कई सपने थे। वो किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी। वो चाहती थी कि एक दिन अपनी मेहनत से एक ऐसी ज़िंदगी बनाए, जहाँ उसे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।
लेकिन इस घर में उसकी पढ़ाई और उसके सपनों की किसी को परवाह नहीं थी।
सीमा के लिए मयूरा सिर्फ़ घर का काम करने वाली लड़की थी। नियति उसे अपनी नौकरानी समझती थी और अनिल… वो हमेशा की तरह चुप रहता था। उसे घर में क्या हो रहा है, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।
इस घर में अगर कोई मयूरा को सच में अपना समझता था, तो वो थी—कविता।
कविता इस घर में कई सालों से काम कर रही थी। मयूरा के माँ-बाप के ज़िंदा रहते भी वो उनके घर का हिस्सा जैसी थी। मयूरा के माता-पिता उसे सिर्फ़ नौकरानी नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य मानते थे।
मयूरा के माँ-बाप के जाने के बाद जब बाकी सबने उससे मुँह मोड़ लिया था, तब कविता ही थी जिसने उसका हाथ पकड़ा था।
वो ही थी जिसने उसे खाना खिलाया था।
वो ही थी जिसने रातों को उसके पास बैठकर उसे संभाला था।
वो ही थी जिसने उसे समझाया था कि उसके माँ-बाप भले ही उसके साथ नहीं हैं, लेकिन वो अकेली नहीं है।
मगर कविता भी इस घर की मालकिन नहीं थी। वो चाहकर भी हर बार सीमा के सामने मयूरा के लिए खड़ी नहीं हो पाती थी।
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कविता सर्वेंट रूम में पहुँची। उसने जल्दी से एक गिलास पानी भरा, दवाई निकाली और मयूरा के कमरे की तरफ बढ़ गई।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
कविता ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
“मयूरा बेटा…”
बिस्तर पर लेटी मयूरा ने हल्का-सा करवट बदला, लेकिन उसकी आँखें बंद ही रहीं।
कविता उसके पास बैठ गई और प्यार से उसके माथे पर हाथ रखा।
“हे भगवान… अभी भी बुखार है।”
मयूरा का चेहरा पीला पड़ रहा था। माथे पर पसीने की हल्की परत थी और होंठ सूख रहे थे।
कविता ने घबराकर पानी का गिलास उठाया।
“बेटा, उठो… थोड़ा पानी पी लो।”
मयूरा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। उसकी आँखों में थकान थी।
“कविता आंटी…”
“हाँ बेटा, मैं हूँ। उठो, दवाई खा लो।” कविता ने कहा
मयूरा उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन कमजोरी के कारण वापस तकिए पर गिर गई।
कविता का दिल घबरा गया।
“आराम से बेटा… धीरे उठो।”
उसने मयूरा को सहारा देकर बैठाया और पानी पिलाया।
मयूरा ने दवाई हाथ में लेते हुए धीमी आवाज़ में पूछा—
“चाची फिर चिल्ला रही थीं?”
कविता ने कुछ पल चुप रहकर उसकी तरफ देखा।
“तुमने सुना?”
मयूरा हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली—
“इस घर में चाची की आवाज़ सुनने के लिए कान लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
कविता के चेहरे पर दुख उतर आया।
“तुम उनकी बातों पर ध्यान मत दिया करो बेटा।”
“कैसे ना दूँ, आंटी?” मयूरा ने थकी हुई आवाज़ में कहा। “हर दिन वही बातें… हर दिन वही ताने।”
कविता ने उसके बालों पर हाथ फेरा।
“तुम ठीक हो जाओ पहले। बाकी सब बाद में देखेंगे।”
मयूरा ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे कॉलेज भी जाना है… दो दिन से क्लास मिस हो रही है।”
“तुम्हारी तबीयत देख रही हो मैं। अभी कॉलेज जाने की बात मत करो।” कविता ने चिंता जताते हुए कहा
“लेकिन मेरी attendance…” तभी मयूरा बोली
“मैं तुम्हारे कॉलेज में बात कर दूँगी।” कविता ने कहा
मयूरा ने तुरंत आँखें खोल दीं और कहा - नहीं आंटी , मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगी
कविता कुछ कह नहीं पाई।
मयूरा को अपनी पढ़ाई की कितनी चिंता थी, ये वो जानती थी। वो लड़की बुखार में भी अपनी किताबों और assignments के बारे में सोच रही थी। क्योंकि उसके लिए पढ़ाई सिर्फ़ पढ़ाई नहीं थी—वो उसके भविष्य का रास्ता थी।
कविता ने उसके माथे पर गीली पट्टी रखी और धीरे से बोली—
“तुम बस आराम करो। मैं हूँ ना।”
मयूरा ने आँखें बंद कर ली और कहा
“आप नहीं होतीं ना, तो मैं सच में अकेली हो जाती।”
कविता की आँखें नम हो गईं। उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, ताकि मयूरा उसकी आँखों में आया दर्द न देख सके।
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दो दिन बाद
लखनऊ, इंडिया
सुबह के दस बजे
दो दिन बीत चुके थे।
मयूरा का बुखार थोड़ा कम हुआ था, लेकिन कमजोरी अभी भी उसके शरीर में बनी हुई थी। वो बिस्तर पर बैठी अपनी किताब खोलकर पढ़ने की कोशिश कर रही थी।
कमरे की खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। सामने टेबल पर उसकी किताबें, कुछ notes और कॉलेज की फाइलें रखी थीं।
मयूरा ने एक पन्ना पढ़ा, फिर थककर आँखें बंद कर लीं।
“मुझे जल्दी ठीक होना पड़ेगा…”
उसने खुद से कहा।
उसी समय दरवाज़ा खुला और कविता अंदर आई। उसके हाथ में नाश्ते की प्लेट थी।
“लो बेटा, पहले कुछ खा लो।”
मयूरा ने किताब बंद कर दी।
“मेरा मन नहीं है, आंटी।”
“मन हो या ना हो, थोड़ा खाना ज़रूरी है।” कविता ने कहा
कविता ने प्लेट उसके सामने रख दी।
मयूरा ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—
“आज चाची ने आपको कुछ कहा तो नहीं?”
“नहीं बेटा।” कविता बोली
“सच?” मयूरा ने पूछा
कविता ने नज़रें चुरा लीं।
मयूरा सब समझ गई।
“आंटी…” मयूरा ने बोला
“कुछ नहीं कहा उन्होंने। तुम बस खाना खाओ।” कविता बोली
मयूरा चुपचाप खाने लगी। तभी बाहर से नियति की आवाज़ सुनाई दी—
“मम्मी! मेरी सफेद वाली ड्रेस कहाँ है?”
सीमा की आवाज़ आई—
“मयूरा से पूछो! वही तो तुम्हारे कपड़े संभालती है।”
मयूरा का हाथ रुक गया।
कविता ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“तुम मत उठना बेटा। मैं देखती हूँ।”
लेकिन तभी नियति कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई।
“मयूरा! मेरी ड्रेस कहाँ है?”
मयूरा ने धीरे से कहा—
“अलमारी की दूसरी shelf पर होगी।”
नियति ने कमरे के अंदर नज़र दौड़ाई।
“तुमने मेरी अलमारी ठीक से लगाई भी है या नहीं?”
“मैंने कल ही लगाई थी…” मयूरा बोली
“तो फिर खुद आकर ढूँढो।” नियति बोली
कविता ने बीच में कहा—
“बिटिया, मयूरा की तबीयत अभी ठीक नहीं है। मैं ढूँढ देती हूँ।”
नियति ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा—
“आप हर बार इसे बचाने क्यों लगती हो?”
कविता का चेहरा सख्त हो गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
नियति कमरे में आई और अलमारी खोलने लगी। कुछ देर बाद उसे ड्रेस मिल गई।
“मिल गई। लेकिन अगली बार अगर मेरी चीज़ें सही जगह पर नहीं मिलीं ना, तो मम्मी से बोलकर तुम्हारा कॉलेज बंद करवा दूँगी।”
मयूरा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में दर्द था, लेकिन आवाज़ शांत रही—
“मेरी पढ़ाई का इससे क्या लेना-देना है?”
नियति हँस पड़ी और बोली
“बहुत उड़ने लगी हो तुम। याद रखो, तुम यहाँ रह रही हो क्योंकि मेरे पापा ने तुम्हें रखा है।”
कविता ने तुरंत कहा—
“बस करो नियति!”
नियति ने कविता की तरफ घूरकर देखा।
“आप बीच में मत बोलिए।”
वो ड्रेस लेकर कमरे से बाहर चली गई।
मयूरा कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखती रही। फिर उसने धीरे से अपनी किताब उठाई।
कविता उसके पास बैठ गई।
“बेटा, उसकी बातों को दिल पर मत लेना।”
मयूरा ने किताब खोलते हुए कहा—
“मैं दिल पर नहीं लेती, आंटी।”
“फिर तुम्हारी आँखें इतनी उदास क्यों हैं?” कविता ने कहा
मयूरा कुछ पल चुप रही।
फिर धीमे से बोली—
“क्योंकि मैं थक गई हूँ, आंटी।”
कविता का दिल भर आया।
“किससे?”
मयूरा ने किताब के पन्ने पर नज़रें टिकाए रखीं।
“हर बार खुद को साबित करने से… हर बार ये दिखाने से कि मैं बोझ नहीं हूँ।”
कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम बोझ नहीं हो, मयूरा। कभी मत सोचना ऐसा।”
मयूरा ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
“एक दिन मैं यहाँ से चली जाऊँगी, आंटी।”
कविता की आँखों में हल्की-सी चमक आई।
“हाँ बेटा… एक दिन तुम अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बनाओगी।”
मयूरा ने धीमी मुस्कान दी।
“और उस दिन मैं आपको अपने साथ ले जाऊँगी।”
कविता ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“मुझे कहीं नहीं जा
ना। तुम खुश रहना, बस यही काफी है।”
मयूरा ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसके मन में एक बात और मजबूत हो गई थी—
उसे अपनी ज़िंदगी बदलनी थी।
वो इस घर में हमेशा के लिए नहीं रहने वाली थी।
वो अपने माँ-बाप के सपनों को अधूरा नहीं छोड़ने वाली थी।
और एक दिन… वो इतनी मजबूत बनेगी कि कोई उसे फिर कभी कमजोर समझने की गलती नहीं करेगा। 🖤
Bye guyss milte hai next chapter mein❤️❤️



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